हल्दीघाटी रणभूमि उपेक्षा की आग में—रक्ततलाई, सरकारी स्मारक और राष्ट्रीय धरोहर बदहाल; संरक्षण की माँग तेज
राजसमंद।
महाराणा प्रताप के पराक्रम और मेवाड़ के स्वाभिमान की अमर प्रतीक हल्दीघाटी रणभूमि एक बार फिर चर्चा में है—लेकिन इस बार इसकी उपेक्षा और लगातार बिगड़ती स्थिति को लेकर गहरी चिंता जताई जा रही है।
रक्ततलाई, जहाँ 18 जून 1576 को प्रताप सेना और मुग़ल सेना के बीच निर्णायक युद्ध हुआ था, आज संरक्षण और विकास के अभाव में बदहाली का प्रतीक बन चुका है।
हालाँकि एएसआई ने इसे संरक्षित क्षेत्र घोषित कर रखा है, लेकिन ज़मीनी हकीकत इसके उलट है—मार्ग, बोर्ड, संकेतक और रखरखाव तक की कमी साफ दिखती है।
NH निर्माण में संवेदनशीलता का अभाव
सूत्र बताते हैं कि हाल ही में बने राष्ट्रीय राजमार्ग निर्माण के दौरान रक्ततलाई और रणभूमि जैसे राष्ट्रीय विरासत स्थलों के प्रति आवश्यक संवेदनशीलता नहीं बरती गई।
नई सड़क पर हल्दीघाटी रणभूमि की ओर संकेतक बोर्ड तक नहीं लगाए गए, जिससे यह स्थल मुख्य पर्यटन मार्ग से कटकर लगभग उपेक्षित स्थिति में पहुंच गया है।
सरकारी स्मारक उपेक्षित—निजी संग्रहालय को बढ़ावा?
सबसे गंभीर सवाल यह उठ रहा है कि चेतक समाधि के पास स्थित सरकारी महाराणा प्रताप राष्ट्रीय स्मारक (शिलान्यास 1997, लोकार्पण 2009) आज पूरी तरह बदहाल पड़ा है—
वहीं सरकारी मार्ग-सूचक बोर्डों में नज़दीक स्थित निजी संग्रहालय को प्रमुखता से दर्शाया जा रहा है।
स्थानीय संगठनों का आरोप है कि सरकारी संसाधनों की अनदेखी कर निजी हितों को बढ़ावा दिया जा रहा है।
पर्यटन माफिया की भूमिका पर शक
इतिहासकार और विशेषज्ञ मानते हैं कि हल्दीघाटी क्षेत्र वर्षों से पर्यटन माफिया, राजनीतिक हस्तक्षेप और गलत प्राथमिकताओं की भेंट चढ़ा हुआ है।
पूर्व केंद्रीय मंत्री अर्जुनराम मेघवाल द्वारा घोषित 5 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाला सरकारी संग्रहालय अभी भी अधर में है—काम शुरू तक नहीं हुआ।
सरकार पर दबाव बढ़ा, संरक्षण की माँग तेज
रक्ततलाई की उपेक्षा, स्मारक की जर्जर अवस्था और निजी हितों के आरोपों के चलते स्थानीय नागरिकों, सामाजिक संगठनों और इतिहासकारों ने सरकार से तुरंत संरक्षण, विकास और मूल स्वरूप बहाली की माँग तेज कर दी है।
अब सवाल यह है—
क्या सरकार हल्दीघाटी और रक्ततलाई को वह सम्मान दे पाएगी, जिसके वे हकदार हैं, या आने वाली पीढ़ियाँ इस इतिहास को सिर्फ किताबों में पढ़ती रह जाएँगी?
